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मेरे श्रद्धेय काका, अब कहाँ महफिल में, गुदगुदी और ठहाका – – महावीर अग्रवाल…..अश्रुपूरित विनम्र श्रद्धांजलि, कोटिशः प्रणाम……… 

साकेत पाण्डेय.... 7869475276...

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अंतरराष्ट्रीय स्तर के नामचीन कवि पद्मश्री सुरेंद्र दुबे जिन्हें मैं अत्यंत ही प्यार से काका जी कहा करता था और वे भी मुझे अपना भतीजा ही समझे और खूब उनका स्नेह और आशीर्वाद मिला। उनकी विराट प्रतिभा का वर्णन नहीं किया जा सकता। वे साक्षात माता शारदे के सुपुत्र थे। जिन्होंने अपनी काव्य कला के माध्यम से हिन्दी व छत्तीसगढ़ी भाषा को विश्व स्तर में विशिष्ट पहचान देने में अग्रणी रहे। उनके इस बहुमूल्य योगदान के हम छत्तीसगढ़ वासी सदैव आभारी रहेंगे। उनका अनायास हमसे बिछुड़ना उम्र भर हमारी आँखों को सजल करेंगी साथ ही मन में उनकी यादों की हूक उठते ही बिन पानी के मीन सा हृदय तड़प उठेगा ।

 

काका जी से मिला अपनत्व स्नेह – – श्रद्धेय ब्रम्हलीन पद्मश्री काका सुरेंद्र दुबे के साथ विगत 2003 के जनवरी माह से फोन के जरिए मेरी मुलाकात होती थी लेकिन 25 फरवरी 2003 में प्रत्यक्ष मुलाकात गांधी गंज के अखिल भारतीय हास्य कवि सम्मेलन में हुई। मैं कार्यक्रम का संयोजक था। मेरे बारे में उन्होंने विस्तृत जानकारी ली फिर कार्यक्रम के पश्चात स्नेह और आत्मीयता का दौर शुरु हुआ फिर तीन जनवरी 2006 को पुनः गांधी गंज में आमंत्रित किया गया था और काका जी बेहतरीन ढंग से मंच संचालन किए थे। वहीं उस समय मैं बेहद दुबला पतला था और कुर्ता पैजामा पहना करता था तो चुटीले अंदाज में वे महफिल के लोगों को परिचय देते हुए कहते थे कि कुर्ता पैजामा पहनकर महावीर ने इतना महीन रुप धारण कर लिया है कि कहीं वो नजर ही नहीं आ रहे हैं अगर आपको कहीं कुर्ता पैजामा हवा में लहराता नजर आए तो समझ लेना यही महावीर है। फिर अनवरत मुलाकात का दौर शुरु हुआ और आसपास के जिन क्षेत्रों में काव्य पाठ करने जाते थे तो मुझे अवश्य बुलाते थे और लगभग सभी मंचो में मेरा परिचय देते हुए कहते थे कि भाई महावीर मेरे पास बैठे हैं। और चुटीले काव्य पंक्तियों से मुझे खूब महफिल में गुदगुदाते थे। वहीं मैं उनको जब चंद्रहासिनी महोत्सव में एकल पाठ के लिए आमंत्रित किया गया था तो वे अकेले वो अपनी काव्य पाठ से पूरी महफिल में छा गए और उनके जुमले अभी साँस लेना है और टाइगर अभी जिंदा है सुनकर लोग भावविभोर हो गए जिसे भूल पाना हर किसी के लिए नामुमकिन है।

 

क्या कहूँ यादें तो अनंत हैं – – –  जब काका जी को पद्म श्री अवार्ड मिला तो उनसे मिलने गया और वे बड़ी आत्मीयता के साथ मुझसे मिले। वहीं जब उन्हें बधाई दिया तो वे मुझे आशीर्वाद दिए उनका आशीर्वाद पाकर मैं धन्य हो गया। इसी तरह स्थानीय पॉलिटेक्निक कॉलेज के अखिल भारतीय कवि सम्मेलन कार्यक्रम में भी आमन्त्रित किया गया था। उस समय नए अंदाज में नयी – नयी कविता सुनाए जिसे सुनकर उपस्थित श्रोतागण मंत्रमुग्ध हो गए। फिर वन्स मोर, वन्स मोर का दौर चला।

 

उनके साथ आत्मीयता का बंधन हुआ मजबूत  – – चक्रधर समारोह के अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में जब उनका आना होता था तो मुझे वे अवश्य बुलाते थे और मंचो से मेरा नाम लेकर आशीर्वाद जरुर दिया करते थे। वहीं जब छत्तीसगढ़ चेम्बर ऑफ कॉमर्स ने रामबाग में आमंत्रित हुए थे तो उस कार्यक्रम का संयोजक मैं ही था और वे संयोजन देखकर अत्यंत ही प्रफुल्लित होकर आशीर्वाद दिया करते थे। इसी तरह इंडियन स्कूल के अखिल भारतीय कवि सम्मेलन कार्यक्रम में काकी जी के साथ सबसे पहले मेरे घर आए थे और सभी सदस्यों को आशीर्वाद देकर फिर काव्य महफिल में गए। इसी तरह श्याम मंडल के कार्यक्रम में भी उनको आमंत्रित किया और वे श्री श्याम प्रभु का दर्शन कर अत्यंत प्रसन्न हुए और सभी श्याम सदस्यों मिलकर भी आनंदित हुए थे।

वहीं तमनार विकास खण्ड के करवाही के अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में मुझे अपने साथ ले गए थे और अध्यक्ष के रुप में मंच में बिठाकर सम्मानित करवाए थे वह पल मेरे लिए जीवन का अविस्मरणीय पल बन गया क्योंकि वह कार्यक्रम उनके साथ मेरा अंतिम कवि कार्यक्रम था। वहीं उस कार्यक्रम में इस कदर गुदगुदाए थे कि लोग लोटपोट हो गए थे। और अपनी हास्य शैली से महफिल में चार चांद लगा दिए थे। शुरु से अंत तक श्रोता पेट पकड़ कर हँसते रहे। इसके पश्चात हम मध्य रात्रि में जाकर सत्यनारायण बाबा धाम का दर्शन किए तो बाबा चैतन्य अवस्था में थे और काका जी को अचानक देखकर प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिए। और वे कहे कि महावीर के कहने से यहां आना और दर्शन हुआ। वहीं उनके साथ लगभग दस कार्यक्रम करवाया और उनके अनगिनत कार्यक्रम में भाग में जाने का सौभाग्य मिला और सदैव प्रतिपल स्नेह व आशीर्वाद मिलता रहा। और खुद को उनके बीच पाकर मैं धन्य हो जाता था।

 

जीवन की मीठी कहानी सुनाकर खूब हँसाते थे…

जब भी शहर आना होता था वे पहले मुझे याद करते थे और कार्यक्रम के पश्चात उनको सम्मान से विदा करने स्टेशन तक जाता था तब मुझे आत्मीय शांति मिलती थी। मन की बात खुलकर बताते थे। जिससे उनकी मेरे प्रति आत्मीयता साफ जाहिर होती थी। और मुस्कुरा कर कहते थे तोर संग चाय अबड मिठाथे.. महावीर ।

 

कहते थे स्नेह से.. मोर संजीवनी बूटी महावीर लाथे – – पद्मश्री सुरेंद्र दुबे काका जी जब भी रायगढ़ आते थे तो पहले से मुझे सुचना देते थे और मैं उनका आतिथ्य किया करता था और कई प्रसंग के दौरान मुझे बड़े ही चुटीले अंदाज में कहा करते थे कि रायगढ़ आए में कोई तकलीफ नई होए काबर कि मोर संजीवनी बूटी (सत्कार की सारी व्यवस्था) यही करथे और यह भी मजाक लहजे में कहा करते थे कि कभू – कभू महावीर के पूँछी ल अइठे बर परथे। (किसी चीज को भूलने में याद दिलाते थे) आज उनके साथ बिताए हुए वह हर पल मेरे मन व हृदय को बोझिल कर रहा है ।

 

उम्र भर याद रहेगी 31 मार्च की वो शाम – – पद्मश्री सुरेंद्र दुबे काका जी विगत 31 मार्च को रायगढ़ जिले के तमनार विकास खण्ड के ग्राम करवाही में आयोजित भव्य हास्य कवि सम्मेलन के प्रमुख थे और मुझे उस कार्यक्रम में अपने साथ ले गए थे साथ ही बतौर मुख्य अतिथि कार्यक्रम अध्यक्षता के लिए आमंत्रित कर अपने सानिध्य में मंच पर कार्यक्रम अध्यक्ष का बेहद आत्मीय सम्मान दिलाए उनका वह आत्मीय स्नेह मेरे प्रति देखकर मेरी आँखें सजल हो गई। वहीं उन्होंने उस कार्यक्रम में इस कदर हँसाए कि पूरी महफिल के लोग हँस – हँसकर लोट – पोट हो गए आज मुझे बहुत ही दुखी हृदय से कहना पड़ रहा है कि मुझे ज्ञात नहीं था कि वह 31 मार्च की शाम का हास्य कवि सम्मेलन अंतिम उनके साथ  कार्यक्रम था और बिताए हुए क्षण। मुझे उम्रभर याद रहेगी 31 मार्च की वह शाम और वह हास्य कवि सम्मेलन जिसे भूल पाना इस जीवन में नामुमकिन है। इसी तरह सांसद बृजमोहन लाल अग्रवाल के पिताजी स्व रामजी लाल अग्रवाल के बारहवां कार्यक्रम रायपुर में अंतिम मुलाकात काका जी से हुई थी और वह मेरा उनके साथ अंतिम मुलाकात थी व लगभग आधे घंटे तक  “हमर सियान किताब” के प्रसंग के माध्यम से अपने मन की बात को अभिव्यक्त किए जो मेरे हृदय से कभी विस्मृत नहीं होगी मुझे नहीं ज्ञात था कि यह उनके साथ अंतिम मुलाकात है… उनकी पुण्यात्मा को कोटि – कोटि नमन्, ऊँ शान्ति, ऊँ शान्ति 🙏🙏

 

कका जी तोर अति सुरता आही

बिन देखे तोला हिरदय छटपटा ही

उमर भर बिछड़े के दुख कम नई होए

तोला खोजत – खोजत हमर नैन पथराही ।।

 

 


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