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विभाष ठाकुर नाम नहीं एक ब्रांड बन गया है…. समाज सेवा. राजनीति.जनहित के कार्य सभीकार्य में विभाष सिंह लेते है बढ़ चढ़कर हिस्सा… विरोध करने पर उतर जाये तो अच्छे अच्छो के निकल जाते है पसीने… बच्चे युवा महिला बुजुर्ग हर वर्ग की आस है विभाष… युवाओं की हक की आवाज बने रायगढ़ के विभाष, ऊर्जा, उत्साह और नवाचार ने राजनीति में मुकाम दिलाया…..समाजसेवा ने भी लोगों का दिल जीता…… विभाष के जन्मदिवस पर विशेष….

साकेत पाण्डेय..... 7869475276

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News of Mirror

 

आज विभाष राजनीति जनसेवा के उस मुकाम पर है जहाँ से उसके लिए कुछ बोलना यानि को सूरज को दीया दिखाने के मानिंद है। विभाष सिंह हर वर्ग के लोगों के मुश्किल समय में खड़े रहता है… स्लम एरिया जहाँ पर कोई पहुंच नहीं पाता वहाँ पर भी विभाष की मौजूदगी पाई जाती है

 

छात्र राजनीति से वर्तमान तक विभाष ने बहुत सी सफलताएं अर्जित किये है। हर उम्र के लोगों का पसंदीदा नेता बन चुका है विभाष.

 

नेता शब्द की परिभाषा बदलने छात्र जीवन से ही राजनीति में उतरे, रायगढ़ के स्कूलों के समीप बनी शराब दुकानों को हटाने जंगी प्रदर्शन का नेतृत्व किया
युवा भारतीय समाज की ऊर्जा, उत्साह और नवाचार का प्रतीक है। आज की कहानी भी ऐसे ही एक युवा नेता की है, जिसने युवाओं को राजनीति की नई परिभाषा से रूबरू कराया। नाम है, विभाष सिंह

ठाकुर। रायगढ़ जिले के रहने वाले विभाष 1998 में एनएसयूआई के शहर अध्यक्ष बने। साल 2000 में जब मध्यप्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ अस्तित्व में आया तब उन्हें रायगढ़ जिले का प्रथम अध्यक्ष बनने का मौका मिला। साल 2007 में यूथ कांग्रेस के जिला अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी मिली। वे 2010 में यूथ कांग्रेस के लोकसभा अध्यक्ष बनाए गए। वर्तमान में प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रदेश सचिव का पद संभाल रहे विभाष उन चुनिंदा युवा नेताओं में से हैं, जिन्होंने

युवाओं को उनका हक दिलाने की लंबी लड़ाई लड़ी। विभाष को रायगढ़ में लोग जितना उनके राजनैतिक सफर से जानते हैं, उससे कहीं ज्यादा लोगों के मन में उनकी समाजसेवी की छवि स्थापित हो चुकी है। विभाष के नेतृत्व में ही रायगढ़ जिला प्रदेश में राजनीतिक माहौल के चलते चर्चा में आया।

*विभाष ने हर कमजोरी को बनाया ताकत

विभाष ठाकुर बताते हैं कि पिता सरकारी अफसर थे। इसलिए शुरुआत से साथन संपन्न रहे। स्कूलिंग रायगढ़ से ही पूरी हुई। इसके बाद कॉलेज भी रायगढ़ से ही किया। अक्सर लोग, वर्तमान परिदृश्य में भी राजनीति को गाली ही समझते हैं। आप यदि किसी को नेता कहें तो सामने वाले को यह शब्द काफी चुभता है, उसे यह गाली लगती है। यही वजह थी कि शुरुआती दिनों में जब मैं स्कूल में था तब राजनीति

से बेहद नफरत किया करता था। इस परिभाषा में बदलने के जुनून के साथ ही मैंने भी राजनीति में कदम रखे। शुरुआत छात्र राजनीति से हुई। एक बार का किस्सा है। मैं कॉलेज में बीएससी की पढ़ाई कर रहा था। इसी बीच हुए एक आंदोलन में शामिल हुआ। यहां आंदोलन के बीच एक अफसर ने मेरी अंग्रेजी को लेकर ताना मार दिया। मैंने उनकी इस बात को अच्छे एंगल से लिया और अपनी अंग्रेजी सुधारने एम.ए. इन इंग्लिश की डिग्री हासिल की।

इस दौरान हमने युवाओं को कॉलेजों में मिलने वाली सुविधाओं को लेकर कलेक्टोरेट का घेराव कर दिया। नेतृत्व मैं कर रहा था, इसलिए कलेक्टर ने मुझे बुलवाया और कहने लगे कि, क्या तुम वकील हो जो युवाओं की वकालत कर रहे हो। उनकी यह बात मुझे चुभ गई। मैंने तय कर लिया कि अब वकालत भी पढ़ेगा। इसके लिए रायगढ़ में ही एलएलबी की पढ़ाई शुरु कर दी।

सच कहूं तो, मेरी जिंदगी कि किताब में दो ही शब्द है, या तो हां या नहीं। इसका मतलब यह है कि मैंने आज तक युवाओं के लिए जितने आंदोलन किए उनको अंजाम तक पहुंचाया। आंदोलन की शुरुआत के बाद पीछे हटने का मुझपर कोई दाग नहीं लग पाया। यही वजह है कि युवाओं ने मुझे अपनी पसंद का युवा नेता चुना।

*शिक्षित बेरोजगारों के लिए बने हक की आवाज


विभाष कहते हैं कि, रायगढ़ में सबसे अधिक उद्योग होने के बाद भी यहां के युवा सबसे अधिक शिक्षित बेरोजगार है। इस मुद्दे को लेकर साल 2000 से 2015 तक लड़ाई लड़ी। इसका ही परिणाम है कि रायगढ़ के विभिन्न उद्योगों को क्षेत्र के स्थानीय युवाओं को नौकरियों में प्राथमिकता देनी पड़ी। इन उद्योगों में युवा वर्ग के लिए नौकरी के दरवाजे खुले। इसके बाद राजनीतिक कॅरियर में बहुत से बदलाव आए। विभाष ने एक आंदोलन का किस्सा शेयर करते हुए बताया कि, रायगढ़ में आज से कुछ साल पहले तक शराब की दर्जनों दुकानें स्कूलों और

कॉलेजों के नजदीकी में खोल दी गई थी। इससे युवाओं की शिक्षा पर तो बुरा असर पड़ ही रहा था, साथ में छात्राएं भी सुरक्षित महसूस नहीं करती थीं। हमने यह मुद्दा उठाया और इसके लिए जीतोड़ लड़ाई लड़ी। प्रशासन ने युवाओं की इस लड़ाई को ईगोस्टिक बना दिया और साल 2017 में रायगढ़ में युवाओं पर 17 बार आंसू गैस के गोले छोड़े गए। इस आंदोलन का नेतृत्त्व मेरे हाथ में था। बहुत तकलीफ झेलने के

 

बाद प्रशासन बैकफुट पर आया और यहां की शराब दुकानों को दूसरे स्थानों पर शिफ्ट करने का निर्णय लिया गया। यह राजनीतिक कॅरियर का सबसे बड़ा आंदोलन था, जिसकी चर्चा रायपुर में भी हुई। कांग्रेस के कई दिग्गज नेताओं ने इसे सराहा। इसके बाद युवाओं को साथ लेकर नशा मुक्ति का आंदोलन शुरु किया, वह आज भी जारी है।

वास्तव में, रायगढ़ को कुछ नहीं मिला


विभाष रायगढ़ को लेकर कहते हैं कि, यह जिला पूरी तरह से बिजनेस हब है। बावजूद इसके महसूस करता हूं कि, यहां के निवासियों का दुख, दर्द समझने वाला कोई नहीं है। रायगढ़ को जो वास्तव में मिलना चाहिए था वह आज तक नहीं मिला। विश्व मंदी के दौर में भी उद्योगिक घरानों ने बड़ा

पैसा कमाया, लेकिन रायगढ़ को कुछ भी नहीं दिया गया। रायगढ़ में पहले भी स्कूल और अस्पताल मौजूद थे, जिनको उद्योगों ने सिर्फ अपना टैग दिया। असल में, इससे कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ, बल्कि हालात और बदतर होते चले गए। रायगढ़ के उद्योगों ने यहां के इतिहास को खत्म करनेका काम किया।

जरूरतमंदों का सहारा बने विभाष

विभाष सिंह ठाकुर सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें समाज के लिए खुद को समर्पित कर दिया है। कोविड काल में जब रायगढ़ के बिजनेसमैन और सफेदपोश लोग अपने घरों में सुरक्षित बैठे थे, तब विभाष ने अपने खर्च पर कई कोविड पीड़ितों की मदद को हाथ आगे बढ़ाया।

विभाष बताते हैं कि कोविड काल के दौरान वे एक वृद्धाश्रम पहुंचे, जहां बुजुर्गों के पास पर्याप्त भोजन नहीं था। बस, यहीं से सोच लिया कि, वे जरुरतमंद के साथ सीधे तौर पर जड़कर काम करेंगे। उन्होंने तत्कालीन पुलिस अधीक्षक से चर्चा कर, युवाओं के लिए वालेंटियरिंग की व्यवस्था कराई और हजारों जरुरतमंदों

तक भोजन का सामान पहुंचाने का काम किया। खुद के पैसों से जरूरतमंदों तक पहुंच रहीं इस मदद में एक समय ऐसा भी आँया जब पैसे खत्म हो गए। बैंक अकांउट खाली हो गया तब विभाष ने लोन लेकर इस काम को आगे बढ़ाया। उनकी इन्हीं खूबियों की वजह से ही लोग उनके साथ खड़े हुए हैं। रायगढ़ के युवाओं के लिए वे किसाँ प्रेरणा से कम नहीं है।


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