सिद्देश्वर नेत्रालय रुक्मणि विहार अघरिया सदन समेत 23 अन्य लोगो को केवल नोटिस देकर क्यों छोड़ दिया जिला प्रशासन आज से दो वर्ष पूर्व????? क्या इनके रसूख के आगे जिला प्रशासन बौना साबित हो गया था!!!! क्या तत्कालीन कलेक्टर और उनकी पूरी टीम सेट हो गई थी दो वर्ष पूर्व?????? क्या बूढ़ी माई के कोप का भी इन्हे डर नहीं था!!!! जो कार्य दो वर्ष पूर्व की जिला प्रशासन नहीं कर पाई उसे वर्तमान कलेक्टर मयंक चतुर्वेदी और उनकी टीम कैसे पूरा करेंगी!!!! क्या बूढ़ी माई की अतिक्रमित जमीन को कलेक्टर मयंक चतुर्वेदी और उनकी टीम आजाद करवा पाएगी???? क्या जवाबदार ट्रस्टियों पर भी गाज गिरेगी!!!
साकेत पाण्डेय... 7869475276...

नगर की कुल देवी बूढ़ी माई मंदिर के ट्रस्ट के करोड़ों रूपए की जमीन पर हुए बेजाकब्जा को खाली नहीं कराया जा सका है। ट्रस्ट की मांग पर पूर्व में प्रशासनिक टीम द्वारा जमीन का सीमांकन कर अतिक्रमणकारियों की सूची तो बना ली गई थी लेकिन किसका कितना कब्जा है, यह आज तक पता नहीं लगा पाई।

तात्कालीन तहसीलदार ने 26 लोगों को सीमांकन का नोटिस भेजा था। इसमें शिवकुमार नायक, प्रहलाद पटेल, रोहित महंत, गोपाल कृष्ण जलतारे, दामोदर खेतान, बालकृष्ण जलतारे, अशोक शर्मा, आराधना नायक, अशोक अग्रवाल इंफ्रास्ट्रक्चर प्रालि, अघरिया सदन, प्रणामी मंदिर, सिद्धेश्वर नेत्रालय, जलतारे होटल, मार्बल दुकान, साहू इलेक्ट्रिकल, सुनील दत्त शर्मा, साहेबराम पटेल, रसिकलाल पांडे, कन्हैयालाल यादव, रामवृक्ष जायसवाल, गांधीराम डनसेना, बंशीधर साहू, दुलीचंद, राजेश गोपाल, किरण देवी और आयुक्त नगर निगम को नोटिस भेजा गया था।

बूढ़ी माई मंदिर ट्रस्ट के नाम पर करीब 7.36 एकड़ जमीन बताई जा रही है। मौके पर सबकुछ स्पष्ट नजर आता है। इतनी बड़ी जमीन के अंदर कई लोगों ने अवैध कब्जे किए हैं। सिद्धेश्वर नेत्रालय का हिस्सा..अघरिया सदन तो पूरी तरह उसी जमीन पर निर्मित है। रुक्मणि विहार जाने के लिए जो रोड बनाई गई है, वह भी ट्रस्ट की जमीन पर ही है। कई दुकानें और मकान भी ट्रस्ट की ही जमीन पर अतिक्रमण कर बनाए गए हैं।

बूढ़ी माई मंदिर ट्रस्ट की जमीन पर अवैध कब्जे प्रमाणित हैं, लेकिन कार्रवाई जीरो है। कई बार सीमांकन के बाद अतिक्रमणकारियों को नोटिस भी दिए गए। लेकिन कार्रवाई के नाम पर चुप्पी साध ली गई। जमीनों पर अतिक्रमण को बढ़ावा देने वाला राजस्व विभाग यहां भी खेल कर गया। बूढ़ी माई मंदिर ट्रस्ट कोतरा रोड की जमीन पर कई लोगों ने कब्जा कर निर्माण कर लिया। कॉलोनी, अस्पताल सबकुछ बन गया। जब शिकायत हुई तो सीमांकन किया गया। आरआई और पटवारियों की टीम ने जमीन का सीमांकन किया है। मंदिर ट्रस्ट की करीब साढ़े सात एकड़ जमीन पर किसने कितना कब्जा किया है, इसका पता भी चल गया।
ओवरब्रिज से लेकर प्रणामी मंदिर के बी
च जितने भी निर्माण हैं, सभी ट्रस्ट की जमीन पर हैं। ट्रस्ट की ओर से ओमप्रकाश पटेल ने सीमांकन व जांच का आवेदन किया था। इसके बाद तहसीलदार रायगढ़ ने पूरी जमीन का विस्तृत सीमांकन करने का आदेश पारित किया था। आरआई मनोज पटेल, नंदराम पटेल, रागिनी साव, पूजा पटेल, पटवारी मनहरण देवांगन, श्रीनिवास पटेल और अनिल राम ने नापजोख की थी। रेलवे फाटक से नक्शा मिलान किया गया। खसरा नंबर 24/1, 25/1, 36, 37 और 52 कुल रकबा 3.065 हे. की सीमा का चिह्नांकन कर लिया गया है।

रायगढ़ में औद्योगीकरण के कारण बढ़ती आबादी के साथ ही जमीन की मांग भी तेजी से बढ़ रही है। वहीं जमीन की मांग को देखते हुए भू-माफिया भी लंबे समय से सक्रिय है। शहर में अधिकांश खाली जमीन पर या तो कोई भू-माफियाओं द्वारा कब्जा कर उसे किसी अन्य को बेच दिया जा रहा है या फिर रसूखदार अपनी जमीन में निर्माण करने के दौरान उससे लगी आस पास की जमीन पर भी कब्जा कर लिये हैं। कुछ इसी तरह का मामला शहर के बूढ़ी माई मंदिर ट्रस्ट की जमीन का भी है।
बूढ़ी माई मंदिर ट्रस्ट की लगभग 8 एकड़ जमीन मंदिर से लेकर कोतरा रोड रेल्वे क्रासिंग तक है जिसमें वर्तमान में लगभग पूरी जमीन पर कब्जा हो गया है। रसूखदारों व भू-माफियाओं की बात तो छोडिय़े प्रशासन ने भी बिना जांच पड़ताल किये ही कोतरा रोड थाना का निर्माण भी ट्रस्ट की जमीन पर ही कर दिया है। पॉश इलाके की इस बेशकीमती जमीन पर कालोनी, हास्पिटल, मकान व शो-रूम इत्यादि बन गये हैं।
सीमांकन हुआ लेकिन आधा अधूरा
बूढ़ी माई मंदिर ट्रस्ट की ओर से पूर्व में जिला प्रशासन को पत्र लिख कर जमीन का सीमांकन कराने व कब्जा खाली करवाने की मांग की गई थी। इस पर प्रशासन ने संज्ञान लेते हुए सीमांकन की कार्रवाई अवश्य कराई लेकिन जांच आधी अधूरी ही रह गई थी। प्रशासनिक टीम की जांच में यह बात तो स्पष्ट हो गई थी कि जमीन बूढ़ी माई मंदिर ट्रस्ट की है जिसमें कई लोगों द्वारा अंतिक्रमण कर मकान, कालोनी हास्पिटल इत्यादि का निर्माण कर लिया है, लेकिन किसने कितनी जमीन पर कब्जा किया है इस बात की जांच नहीं हो पाई थी। वहीं अतिक्रमण की पुष्टि होने के बाद भी बेजाकब्जा धारियों को जमीन से बेदखल कर ट्रस्ट को कब्जा नहीं दिलाया जा सका था। ऐसे में कब्जाधारी बचा निर्माण भी पूरा कर लिये र्हैं।








