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भूमाफियाओ का जोरदार खेल.. आबंटित क़ृषि भूमि को कई टुकड़ो मे प्लॉट बनाकर बेचा… आवंटन जमीन को स्टाम्प पेपर में बेचा…. खरीदने वाले बना रहे आलीशान मकान…. सरकार ने पट्टे पर दी थी एक-एक एकड़ जमीन, बोईरदादर में अवैध प्लॉटिंग की नई इबारत…. शासन प्रशासन मौन….

साकेत पाण्डेय..... 7869475276....

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राजस्व अनुविभाग में इस तरह आवंटन जमीनों और सरकारी जमीनों को बेचने का सिलसिला निरंतर जारी है रुकने का नाम ही नहीं ले रहा है। सांगीतराई, बोईरदादर, विजयपुर, लामीदरहा, बड़े अतरमुड़ा, उर्दना, भगवानपुर, छातामुड़ा.. बोन्दा टिकरा.. जामगांव समेत अन्य क्षेत्रों में रिक्त सरकारी जमीनों की सुध नहीं ली जा रही है। भूमाफिया इन जमीनों को कब्जानेबेचने में लगे हुए हैं। शासन प्रशासन मूक दर्शक की मानिंद बस देख ही रही है।

सरकारी जमीनों पर अतिक्रमण कर उसे स्टाम्प में बेचने के मामले में कार्रवाई नहीं हो सकी। हर अधिकारी के तेवर नरम पड़ चुके हैं। इसकी देखादेखी अब सरकार से पट्टे पर आवंटित जमीन पर भी प्लॉटिंग हो चुकी है। स्टाम्प पेपर पर ऐसी जमीनों को टुकड़ों में बेचा गया है। बोईरदादर में दो एकड़ जमीन पर कई लोगों ने आलीशान मकान बना रहे हैं। रायगढ़ नगर निगम की सीमा में जमीनों का खेल चरम पर है। कोई भी किसी भी जमीन पर प्लॉट काट रहा है। न रजिस्ट्री, न डायवर्सन, न रेरा पंजीयन, न ही विकास अनुज्ञा। आसानी से रुपए कमाने की चाह में कई लोगों ने आवंटन जमीन को भी कौडिय़ों के मोल बेच डाला। बोईरदादर में ऐसा ही मामला सामने आया है।

 

ग्राम विजयपुर में शासन ने भूमिहीनों को एक-एक एकड़ शासकीय भूमि पट्टे पर प्रदान की थी ताकि वे कृषि कार्य कर सकें। खसरा नंबर 4/9 रकबा 0.405 हे. का आवंटन रघु खडिय़ा को किया गया था जबकि खनं 4/11 रकबा 0.405 हे. का आवंटन बाबूलाल, पुनीलाल पिता रामप्रसाद व अन्य को किया गया था। वर्तमान में दोनों की जमीन से समान रूप से 0.085 हे. रास्ते के लिए शासन के पक्ष में त्याग दिया गया। बाकी जमीन को इन्होंने पहले ही कई लोगों को बेच दिया है। दोनों ने करीब 20 लोगों को स्टाम्प पेपर पर प्लॉट बेचे हैं। अब इस जगह पर मकानों का निर्माण हो रहा है। शासकीय रिकॉर्ड में यह अब भी कृषि भूमि ही है। दोनों ही भूमिस्वामियों ने आवंटित जमीन को कई टुकड़ों में बांटकर स्टाम्प पेपर पर बेचा है। आवंटन भूमि होने के कारण बिना कलेक्टर की अनुमति के विक्रय नहीं हो सकता। लेकिन नियम विरुद्ध कृषि भूमि को टुकड़ों में बेच दिया गया है। अब इस जमीन पर खेती के बजाय आलीशान मकानों की फसल लहलहा रही है। कुछ मकान 40-50 लाख की लागत से बन रहे हैं। कुछ ने व्यावसायिक निर्माण कर लिए हैं।


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