अभी तो जहाँ बाकी है… अपनी कुशल कार्यशैली से जनता का विश्वास जीतना है.. मुस्कुराहट और धैर्य है गौतम का शस्त्र…पिता की विरासत को गंभीरता से आगे बढ़ा रहे गौतम रायगढ़ मंच-माला-माइक से दूर अपनी जड़ें मजबूत कर रहे गौतम बोले , प्रेम से राजनीति करता हूं, किसी पद की लालसा नहीं….
साकेत पाण्डेय.... 7869475276....


अभिषेक उपाध्याय की कलम से….
दोपहर 11 बजे कोड़ातराई के मेघा रेस्टोरेंट के समीप भीड़ के बीच में स्पोर्ट्स शू, जींस के साथ चेक वाली बुशर्ट पहने युवक की बात सब ध्यान से सुन रहे थे। चाय पर चर्चा मुकम्मल होने के बाद ये वहां से रायगढ़ वापस आ जाते हैं और भाजपा सदस्यता अभियान के संबंध में अपने नियर-डियर के साथ बैठक करते हैं। ये और कोई नही गौतम अग्रवाल हैं जो भाजपा के

दिग्गज नेता स्व. रोशन लाल अग्रवाल के पुत्र हैं। यूं तो 10 साल पहले ही उनका जमीनी स्तर पर सियासी सफर शुरू हो चुका था पर असल परीक्षा 3 साल पहले शुरू हुई। जब अचानक एक हादसे में पिता का साया उठ गया। रोशन अग्रवाल किसी पहचान के मोहताज नहीं है। रायगढ़ भाजपा के पर्याय रोशन ने गौतम को पास रखकर राजनीति का ककहरा सिखाया। भाजपा के चुनावी अभियान के रणनीतिकार और पिता के
सबसे भरोसेमंद गौतम आज अपने बूते वह कर गुजरने का माद्दा रखते हैं जैसा उनके पिता ने सोचा था। वह मानते हैं कई मामलों में पिता और उनके सिद्धांत अलग है पर पार्टी के प्रति समर्पण भाव कहीं से भी कम नहीं है।

वह धीर हैं, गंभीर हैं और योजनबद्ध तरीके से आगे बढ़ रहे हैं। वह राजनीति का हर सबक सीख रहे और अपनी लकीर लंबी कर रहे। अपने पिता की ही तरह वह भी छोटी जगहों पर नेतृत्व क्षमता विकसित करने के उद्देश से कुछ लोगों को नेता और जनप्रतिनिधि के दायित्वों को समझा रहे। वह इन्हें साथ लेकर घूमते और सबसे मिलवाते।
गौतम राजनीति में सक्रिय हैं और 2023 विधानसभा के समय इनकी दावेदारी तगड़ी थी पर समीकरण कुछ और बन गया। मायूस न होकर वह पार्टी की गतिविधियों से सक्रियता से जुट गए। राजनिति किंतु -परंतु से नहीं चलती पर आज अगर रोशन होते तो भाजपा की राजनीति ऐसी ना होती।

खैर, लाइम लाइट से दूर और मंच-माइक-माला से तौबा किए गौतम सोशल मीडिया में जन्मदिन की बधाई और अपनी चाय मुलाकात को लेकर छाए हुए हैं। जमीनी कसरत के बाद डिजिटल मीडिया से नेटीजन को साधना अच्छी रणनीति है। तभी तो खंड-खंड संगठन हो या फिर मोर्चा इनमें गौतम की स्वीकार्यता और हनक साफ दिखती है।

लोगों से मिलते गौतम
सदस्यता अभियान में जुटे गौतम कहते हैं कि मुझे भाजपा संगठन में किसी पद की लालसा नहीं है। ना ही कुर्सी का मोह है। मैं अपनी कुर्सी खाली कर देता हूं, मुझे पहली पंक्ति में भी बैठने की लालसा नहीं है। राजनीति ऐसी करो कि विरोधी भी आपका मुरीद हो, वह आपके विरुद्ध कुछ बोलने से पहले कई बार सोचे। मेरा काम बोलता है, मैं साफ सुथरी राजनीति करने पर भरोसा रखता हूं। झूठे आश्वासन से बेहतर है साफ मना कर देना। खासकर स्वास्थ्य और पुलिस से सम्बन्धित मामलों में, मतभेद होगा पर मनभेद नहीं।
मेरी अपनी टीम है जो पार्टी को मजबूत करने में लगी है। हम संगठन का अंग है और अपनी जगह पर पार्टी के झंडाबरदार हैं। पार्टी के पक्ष में वोटर को कैसे करना है और कौन उसे प्रभावित कर सकता है हम यह वर्किंग करते हैं।
लोग बदले और उनकी आस्थाएं भी

- गौतम बताते हैं कि पापा की मौत के बाद सबकुछ एकदम से सब बदल गया। स्थिति आज भी सामान्य नहीं है, परिवार सदमे में है पर आगे तो बढ़ना है। शुरुआत के 8 महीने तक तो मैं परिवार के अलावा कुछ सोच भी नहीं रहा था। भावनात्मक बिखराव के बीच मां, बहन, पत्नी और पुत्र को संभालना असंभव लगा। मैं खुद अस्थिर था। उसी दौरान उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी को लेकर भी काफी चर्चा हुई, पता नहीं लोगों को इतनी जल्दबाजी क्यों रहती हैं मैं तब भी खामोश था और आज भी खामोश हूं। मैंने समय के साथ लोगों को बदलते देखा है, आस्थाएं बदलते देखी हैं। जो कभी अपने हुआ करते थे आज किनारा किए हुए हैं फिर भी जो बचे हैं वह विशुद्ध रूप से हमारे साथ हैं। एक तरह से फिल्टरेशन हुआ। राजनीति में भी हमारे अपने लोगों को धीरे-धीरे दरकिनार किया जाने लगा है। इससे मुझे और मेरे अपनों को कोई फर्क नहीं पड़ता। हमारा मनोबल कोई नहीं तोड़ सकता। हम भाजपा संगठन की राजनीति करते हैं और भाजपा का हरेक सच्चा सिपाही हमारे साथ है। राजनीति क्षणिक लाभ के लिए नहीं करते। पापा जैसा बनना और उनके जूतों में खुद के पैर को फिट करना फिलहाल मुश्किल है पर उनके ही आशीर्वाद से हम आगे बढ़ रह
पीएम मोदी का स्वागत करते गौतम
प्रेम और समर्पण की राजनीति पर फोकस
गौतम का मानना है कि भाजपा में हो या फिर कांग्रेस में हो गुटबाजी कभी खत्म नहीं हो सकती। हां, इसे कम किया जा सकता है लोगों पर भरोसा करके। किसी के किसी के साथ उसका उठने-बैठने पर ध्यान मत दें बस यह ध्यान दें कि वह पार्टी के प्रति कितना समर्पित है। यदि यह भावना आ जाती है तो गुटबाजी होगी ही नहीं। मैं प्रेम की राजनीति पर भरोसा करता हूं यही एकमात्र मेरा मूलमंत्र है। जैसा कि पापा कहते थे कि जो जितना ज्यादा जमीन से जुड़ा होगा वह उतना अच्छा जनप्रतिनिधि होगा। हम जमीन से जुड़े हैं, लोगों से जुड़े हैं। लोगों के हर छोटे-मोटे सुख-दुख में साथ खड़े होना यही हमारी राजनीति का आधार है। अभी के समय सरकार किसी की भी हो भ्रष्टाचार चरम पर हैं। आम आदमी के छोटे-छोटे कामों के लिए परेशान न होना पड़े यह एक जनप्रतिनिधि / नेता का कार्य है।
अभी के समय में जननेता वही है जिससे उसके कार्यकर्ता संतुष्ट है। उन्हें उनका हक मिलना चाहिए, वह सिर्फ कुर्सी, दरी बिछाने के लिए नहीं है। मैं सभी कार्यकर्ताओं से समभाव से जुड़ा हूं। मैं प्रेम से राजनीति करता हूं क्योंकि मेरा मानना है कि प्रेम से कोई भी बड़ा से बड़ा कार्य आसानी से हो सकता है। अन्यथा अकड़ तो सबके पास है और अकड़ से सिर्फ नुकसान या फिर स्वयंभू की फीलिंग आती है।
अपने पुत्र और माता पिता के साथ
स्वच्छ-स्वथ्य राजनीति पर केंद्रित

खुद एक दैनिक समाचार पत्र जनकर्म के संपादक होते हुए भी वह मीडिया की नजरों से दूर, किसी भी बयानबाजी के हिस्सेदार नहीं बनते। बकौल गौतम, मैं फिलहाल अपनी राजनीति से संतुष्ट हूं। 2023 विधानसभा टिकट की दौड़ में अंत तक मेरा नाम था जबकि मैं रायगढ़ छोड़कर कहीं नहीं गया। ना मैंने रायपुर की परिक्रमा की ना ही नहीं दिल्ली दरबार में हाजिरी दी। मेरा नाम आखरी तक बना रहा तो यह इस बात को बताता है कि मैं जमीन स्तर पर कार्य कर रहा हूं। भाजपा संगठन भी सर्वे के आधार पर ही नाम तय करती है। मेरे पास आगे बहुत समय है हड़बड़ी नहीं करनी। बस स्वच्छ-स्वथ्य राजनीति करनी है।
पिता के साथ चुनाव प्रचार के दौरान गौतम












