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रायगढ़ जिले के लाखा ग्राम पंचायत का आश्रित ग्राम ‘चिरई पानी’ मे औद्योगिक गुंडागर्दी: ‘अग्रोहा’ और ‘सिंघल’ स्टील का महा-घोटाला, 5 एकड़ सरकारी जंगल डकार गए रसूखदार !!!!! विकास की आड़ में रायगढ़ के जल, जंगल और ज़मीन का बेरहमी से चीरहरण जारी है !!!! प्रशासन की नाक के नीचे यह और सिस्टेम की मिलीभगत से रसूखदार उद्योगपतियों ने कानून को अपनी जेब में रख लिया है !!!!!!

साकेत पाण्डेय.... 7869475276....

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रायगढ़ जिले के लाखा ग्राम पंचायत का आश्रित ग्राम ‘चिरई पानी’ मे औद्योगिक गुंडागर्दी: ‘अग्रोहा’ और ‘सिंघल’ स्टील का महा-घोटाला, 5 एकड़ सरकारी जंगल डकार गए रसूखदार !!!!! विकास की आड़ में रायगढ़ के जल, जंगल और ज़मीन का बेरहमी से चीरहरण जारी है !!!! प्रशासन की नाक के नीचे यह और सिस्टेम की मिलीभगत से रसूखदार उद्योगपतियों ने कानून को अपनी जेब में रख लिया है !!!!!!

जिले के लाखा ग्राम पंचायत का आश्रित ग्राम ‘चिरई पानी’ आज इन औद्योगिक घरानों की तानाशाही और प्रशासनिक लकवे का जीता-जागता गवाह बन चुका है। यहाँ स्थापित अग्रोहा स्टील एंड पावर प्राइवेट लिमिटेड और सिंघल स्टील प्लांट ने सत्ता और पैसे की हनक दिखाते हुए ‘बड़े झाड़ के जंगल’ की करीब 5 एकड़ बेशकीमती सरकारी ज़मीन को निगल लिया है। यह महज अतिक्रमण का मामला नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण के कत्लेआम और पंचायती राज की छाती पर पैर रखकर किए गए एक सुनियोजित ज़मीन घोटाले की खौफनाक दास्तान है। पटवारी की ताज़ा जांच रिपोर्ट ने इस ‘लैंड टेररिज्म’ (भूमि आतंकवाद) पर सरकारी मुहर लगा दी है, लेकिन सवाल यह है कि क्या कुंभकर्णी नींद में सोया प्रशासन इन मगरमच्छों पर कोई कार्रवाई करने की हिम्मत जुटा पाएगा?अग्रोहा स्टील का ‘पार्किंग सिंडिकेट’: बिकी पंचायत, कटा जंगल..अग्रोहा स्टील प्लांट ने कानून की धज्जियां उड़ाते हुए करीब 3 एकड़ सरकारी जंगल को अपनी बपौती समझ कर पूरी तरह से कब्जा लिया है। जिन जमीनों पर कभी लहलहाते पेड़ हुआ करते थे, आज वहाँ पेड़ों की कब्रगाह पर उद्योगों का ज़हरीला स्लैग और डस्ट पाट दिया गया है। दबंगई का आलम यह है कि इस अवैध कब्जे को सुरक्षित करने के लिए प्लांट ने बाकायदा बाउंड्री वॉल तान दी है, फेंसिंग कर दी है और हाई-टेंशन तारों के खंभे गाड़ दिए हैं। इस पूरे महा-घोटाले में स्थानीय पंचायत का किरदार सबसे ज्यादा दागी और शर्मनाक है। हैरत की बात यह है कि

तत्कालीन सरपंच ने खुलेआम अपने अधिकारों का दुरुपयोग करते हुए इस आरक्षित वन भूमि को प्लांट को ‘पार्किंग’ के लिए किराए पर सौंप दिया। यह सीधा-सीधा पंचायत और उद्योगपतियों के बीच हुए एक बड़े भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है। आज इस अवैध पार्किंग में बाहरी राज्यों से आने वाले बेबस ट्रक ड्राइवर पांच-पांच दिनों तक बंधकों जैसी स्थिति में पड़े रहते हैं। उनके साथ खुलेआम मारपीट और चोरियां हो रही हैं, लेकिन अग्रोहा का सुरक्षा तंत्र पूरी तरह से आंखें मूंदे बैठा है।सिंघल प्लांट का ‘जहरीला साम्राज्य’: 2010 से जारी है ज़मीन हड़पने का खेल..दूसरी तरफ, इसी ग्राम में सिंघल स्टील प्लांट का ज़मीनी आतंकवाद भी अपने चरम पर है। सिंघल उद्योग ने भी ठीक इसी तर्ज पर लगभग 2 एकड़ सरकारी ज़मीन को अपने अवैध साम्राज्य का हिस्सा बना लिया है। ग्रामीणों के कड़े विरोध के बावजूद, प्रशासन के मौन समर्थन (मौन स्वीकृति) के दम पर साल 2010 से यह कब्जा लगातार बढ़ता जा रहा है। सिंघल प्लांट ने इस सरकारी ज़मीन पर एक विशालकाय नीला स्ट्रक्चर खड़ा कर दिया है और इस अवैध विस्तार की कीमत चुकाई है यहाँ के बेशकीमती सागौन, सरई और बांस के पेड़ों ने, जिन्हें रातों-रात बेरहमी से काट डाला गया। उद्योगों का यह ज़हरीला खेल यहीं नहीं रुका; प्लांट से निकलने वाले फ्लाई ऐश, स्लैग और ज़हरीले रसायनों वाले पानी को बहाने के लिए इसी सरकारी ज़मीन का सीना चीरकर एक नाली बना दी गई। इस ज़हरीले पानी ने आसपास के गरीब किसानों की उपजाऊ जमीनों को पूरी तरह से बंजर कर दिया है। आज वहाँ धान का एक दाना तक नहीं उगता। हालांकि, जब सिंघल प्रबंधन से उनके इस काले कारनामे पर सवाल किया गया, तो वे सफेद झूठ बोलते नज़र आए। उनका रटा-रटाया तर्क है कि उन्होंने यह संपत्ति 2023 में एनसीएलटी से खरीदी है और यह बाउंड्री 2002 से मौजूद है। लेकिन उनके ये खोखले दावे ग्रामीणों के उस खौलते गुस्से के सामने नहीं टिकते, जो सिंघल प्लांट के नए विस्तार के लिए होने वाली ‘जन सुनवाई’ को लेकर सुलग रहा है। ग्रामीण खौफ में हैं कि जो उद्योग पहले से ही उनकी नसें निचोड़ रहा है, वह विस्तार के बाद पूरे गांव को ही निगल जाएगा।कब टूटेगी प्रशासन की नींद? कब चलेगा न्याय का बुलडोजर?पटवारी की जांच रिपोर्ट ने शीशे की तरह साफ कर दिया है कि चिरई पानी की 5 एकड़ ज़मीन पर इन दोनों औद्योगिक घरानों का अवैध और जबरन कब्ज़ा है। अब गेंद सीधे तौर पर जिला प्रशासन और राज्य सरकार के पाले में है। जनता अब पूछ रही है कि क्या 10

सालों से चल रहे इस ‘लैंड ग्रैबिंग सिंडिकेट’ पर प्रशासन का बुलडोजर चलेगा? क्या पंचायत में बैठे उन भ्रष्ट चेहरों पर एफआईआर (अग्रुक) दर्ज होगी जिन्होंने सरकारी जंगल का सौदा कर दिया? क्या पर्यावरण को तबाह करने वाले इन रसूखदारों से करोड़ों रुपये का जुर्माना वसूला जाएगा? या फिर एक बार फिर, रायगढ़ का पूरा सरकारी अमला इन पूंजीपतियों की तिजोरियों के सामने अपना ईमान गिरवी रख देगा? चिरई पानी के ग्रामीण अब आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं और उन्हें अब केवल और केवल न्याय चाहिए। प्रशासन को अब तय करना होगा कि वह कानून के साथ खड़ा है या ज़मीन लुटेरों के साथ।


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