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रुक्मणि विहार का रहस्य चंद्रकांता सीरियल से भी परे हैँ !!!!! रुक्मणि विहार के रसूखदार इसका बाल भी बांका नहीं होने देंगे !!!!!!! रुक्मिणी विहार बनाम राजस्व प्रणाली . “सुरखाब के पर” और राजस्व की विवशता: रुक्मिणी विहार क्षेत्र में RI (राजस्व निरीक्षक) और पटवारियों की बेबसी यह संकेत देती है कि यहाँ मामला केवल जमीन का नहीं, बल्कि “सिस्टम के सरेंडर” का है। जब सीमांकन की गाड़ी यहाँ आकर रुक जाती है, तो यह तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि ‘प्रशासनिक पैरालिसिस’ है…… तंत्र पर ‘धनबल’ और ‘रसूख’ का जबरदस्त प्रभाव

साकेत पाण्डेय..... 7869475276....

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क्या कभी कुछ होगा रुक्मणि विहार का या यूँ ही ढोंग होता रहेगा…..रुक्मिणी विहार बनाम राजस्व प्रणाली…… “सुरखाब के पर” और राजस्व की विवशता:रुक्मिणी विहार क्षेत्र में RI (राजस्व निरीक्षक) और पटवारियों की बेबसी यह संकेत देती है कि यहाँ मामला केवल जमीन का नहीं, बल्कि “सिस्टम के सरेंडर” का है। जब सीमांकन की गाड़ी यहाँ आकर रुक जाती है, तो यह तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि ‘प्रशासनिक पैरालिसिस’ है…… तंत्र पर ‘धनबल’ और ‘रसूख’ का जबरदस्त प्रभाव

रुक्मणि विहार मे क्या “” सुरखाब के पर “”” लगे हैँ जो यहाँ आते ही राजस्व मण्डल के जितने भी आर आई पटवारी हैँ सभी बेबस हो जाते हैँ !!!!!! मेरे पत्रकार मित्र कहते हैँ “” अरे मत छापो रुक्मणि विहार का यहाँ का कुछ नहीं हो सकता “”” पर मुझे न्याय प्रणाली पर पूरा भरोसा हैँ !!!! रसूख.. धनबल… एप्रोच… दबाव के आगे हर बार घुटने टेकते आया हैँ जिला प्रशासन !!!!! बूढ़ी माई मंदिर समिति ट्रस्ट भी दृढ़ता पूर्ण तरीके से रुक्मणि विहार के मामले मे अपनी बात नहीं रख पाता !!!!! अघरिया सदन भी खिसक गया !!!! किसी नें सही कहा हैँ आर आई पटवारी भगवान होते हैँ !!!! पर कुछ लोगो के लिए !!!!!

नगर देवी बूढ़ी माई मंदिर ट्रस्ट के जमीन का सीमांकन हो गया… पूरे क्षेत्र का सीमांकन हुआ पर जैसे ही गाडी रुक्मणि विहार के पास आई उसमे इमरजेंसी ब्रेक लग गया… यें ब्रेक क्यूँ कैसे लगा समझ से परे हैँ… हर बार यही होता हैँ… यहाँ पर अब लोग सीमांकन से डरते नहीं हैँ खुश होते हैँ…. वो जानते हैँ कुछ होगा ही नहीं…. सीमांकन का ब्रेक रुक्मणि विहार पास आकर लगना ही हैँ….

पता नहीं क्या रसूख दबाव बनाते हैँ रुक्मणि विहार के संचालक मण्डल की पूरा गेम पलट जाता हैँ…. इसमे गलती मंदिर ट्रस्ट वालों की भी हैँ वो इनका सामना ठीक से नहीं कर पाते…. हर बार रुक्मणि विहार ही लाइम लाइट मे रहता हैँ….

 

अघरिया सदन भी खिसक गया

आखिर कौन सा दबाव पड़ा की अघरिया सदन भी खिसक गया वो भी इसके दायरे मे नहीं आ रहा हैँ। अब सीमांकन कैसे हो रहा हैँ इस पर प्रकाश कोई नहीं डाल रहा हैँ। सा आर आई पटवारी का कार्य हैँ थोड़ा सा नक़्शे मे घुमा दिए हो गया खेल।

 

आखिर क्यों भारी पड़ जाते हैँ रुक्मणि विहार वाले

रुक्मणि विहार का मालिक कौन हैँ शहर का बच्चा बच्चा जानता हैँ… इनके साथ सत्ता पार्टी दल के बहुत बड़े नेता का वरदहस्त इन्हे प्राप्त हैँ… फिर धनबल हमेशा राजस्व विभाग के आगे सर्वोपरि हैँ !!!! इतना सभी जान गए हैँ कि रुक्मणि विहार का कभी भी कुछ भी नहीं हो सकता।

 

राजनीतिक वरदहस्त: , सत्ताधारी दल के बड़े नेताओं का संरक्षण किसी भी नियम-कायदे को ठंडे बस्ते में डालने के लिए काफी होता है।

नक्शों का खेल, डेटा में हेरफेर (नक्शा घुमाना) सबसे आसान तरीका है किसी भी अवैध कब्जे को वैध दिखाने का। इसमें RI और पटवारी की भूमिका एक ‘लेखक’ की तरह हो जाती है जो भूगोल बदल देते हैं।

संस्थागत विफलता (बूढ़ी माई मंदिर ट्रस्ट व अघरिया सदन):

अघरिया सदन का खिसकना: यह दर्शाता है कि दबाव इतना तीव्र है कि सामाजिक और प्रभावशाली संगठन भी अपनी जमीन बचाने के बजाय पीछे हटने में भलाई समझ रहे हैं।

ट्रस्ट की शिथिलता: मंदिर समिति की कमजोरी ने भू-माफियाओं के लिए ‘गोल्डन गेट’ खोल दिया है। जब रक्षक ही मौन हो जाएं, तो भक्षक का मनोबल बढ़ना स्वाभाविक है।

पत्रकारिता का ‘चेतावनी’ मोड:

आपके पत्रकार मित्रों का यह कहना कि “यहाँ कुछ नहीं हो सकता”, व्यवस्था के प्रति गहरे अविश्वास और अघोषित सेंसरशिप को दर्शाता है।

 

यह एक ‘क्रोनिक एडमिनिस्ट्रेटिव फेल्योर’ (पुराणी प्रशासनिक विफलता) का मामला है, जहाँ भू-राजस्व संहिता की धाराओं पर ‘रसूख की स्याही’ भारी पड़ रही है।


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